तारीख थी 15 अक्टूबर 1995। आसमान का राजा कहा जाने
तारीख थी 15 अक्टूबर 1995। आसमान का राजा कहा जाने वाला डबल डेकर लग्जरी प्लेन पैन एम फ्लाइट सिक्स। अपने 70 यात्रियों और सात क्रू मेंबर्स के साथ हवाई से सैन फ्रांसिस्को के लिए उड़ान भर चुका था। लोग अपनी सीटों पर आराम से बैठे थे। कोई किताब पढ़ रहा था, कोई खिड़की से बाहर प्रशांत महासागर की नीली चादर को देख रहा था, तो कोई अपने आने वाले कल के सपने बुन रहा था।
लेकिन अचानक प्लेन के शांत माहौल में एक चीख गूंजी। एक दो नहीं बल्कि चार नकाबपश लोग अपनी सीटों से उठे। उनके हाथों में हथियार थे। उन्होंने प्लेन को हाईजैक कर लिया था। यात्रियों की सांसे थम गई। बच्चों का रोना और बड़ों की घबराहट से पूरा प्लेन गूंज उठा। यह खबर जैसे ही एटीसी तक पहुंची, धरती पर हड़कंप मच गया। रेस्क्यू मिशन की तैयारियां शुरू हो गई। लेकिन इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता ठीक 5 मिनट बाद पैन एम फ्लाइट सिक्स रडार से हमेशा के लिए गायब हो गई।
इसके पीछे का कारण पहला तो हाईजैकर्स ने प्लेन का लोकेशन सिस्टम बंद कर दिया था। पर असली खतरा तो कुछ और ही था। एक ऐसा खतरा जिसे इंसान कंट्रोल नहीं कर सकता। प्लेन सीधा प्रशांत महासागर के सबसे बड़े और खतरनाक तूफान टाइफून के मुंह में जा चुका था। भयानक हवाएं प्लेन को किसी खिलौने की तरह उछाल रही थी। पायलट अपनी पूरी ताकत से प्लेन को बचाने की कोशिश कर रहा था। पर अगले 2 घंटे तक प्लेन का कंट्रोल प्रकृति के हाथों में था और 2 घंटों के इस जानलेवा संघर्ष के बाद प्लेन का एक इंजन फेल हो गया और इसके थोड़ी देर बाद दूसरा इंजन भी फेल हो गया। प्लेन आग के गोले की तरह सीधा समुद्र की ओर गिरने लगा। प्लेन समुद्र की सतह से टकराने ही वाला था कि कुछ लोगों ने हिम्मत दिखाई और हाईजैकरों को मार गिराते और टूटे हुए दरवाजे से ठंडे और अनजान समुद्र में छलांग लगा दी।
प्लेन एक भयानक धमाके के साथ पानी में समा गया लेकिन 60 लोग किसी तरह बच गए थे। उनके चारों तरफ मीलों तक सिर्फ और सिर्फ प्रशांत महासागर की डरावनी लहरें थी। किस्मत से जहां प्लेन क्रैश हुआ था, उससे बस 100 मीटर की दूरी पर एक चट्टान समुद्र से बाहर निकली हुई थी। सब ने अपनी बची कुची ताकत लगाकर उस चट्टान पर पनाह ली। भीगे हुए, कांपते हुए, डरे हुए, वे 60 लोग उस छोटी सी चट्टान पर एक दूसरे से लिपटे हुए थे। उनके पास ना तो कोई फोन था, ना कोई सिग्नल, ना कोई उम्मीद। प्लेन का मलबा भी गहरे पानी में डूब चुका था। तभी एक पैसेंजर को याद आया कि उसके बैग में एक दूरबीन थी जो किसी तरह उसके साथ बच गई थी। उसने कांपते हाथों से दूरबीन उठाई और चारों तरफ देखने लगा और तभी उसे एक उम्मीद की किरण दिखी।
लगभग आधा किलोमीटर दूर धुंध में लिपटा एक छोटा सा द्वीप वो चिल्लाया आइलैंड वहां एक आइलैंड है। जो लोग तैरना जानते थे उन्होंने एक पल भी नहीं गवाया उन्होंने मौत के इस महासागर में फिर से छलांग लगा दी। नीचे खतरनाक शार्क थी ऊपर ऊंची-ऊंची लहरें। लेकिन जीने की इच्छा इन सबसे बड़ी थी। घंटों की मशक्कत के बाद सिर्फ 15 20 लोग ही उस द्वीप के रेतीले किनारे तक पहुंच पाए। बुरी तरह थके हुए लेकिन जिंदा। द्वीप पर पहुंचे लोगों ने एक पल भी आराम नहीं किया। उन्हें पता था कि चट्टान पर फंसे बाकी लोगों को यहां लाना होगा। वरना वे लहरों या भूख प्यास से मर जाएंगे। उन्होंने द्वीप पर पड़ी सूखी लकड़ियों और बेलों को इकट्ठा किया और किसी तरह एक काम चलाऊ बेड़ा बनाया। उस टूटे फूटे बेड़े को लेकर वे दोबारा उस जानलेवा समंदर में उतर गए। एक-एक करके कई चक्कर लगाकर उन्होंने चट्टान पर फंसे हर इंसान को द्वीप पर पहुंचाया। जब सारे 60 लोग उस अनजान जमीन पर इकट्ठा हुए, तब जाकर उन्हें अपनी असली हालत का एहसास हुआ। यह कोई जन्नत नहीं थी।
यह एक सुनसान वीरान द्वीप था। कुछ नारियल के पेड़, थोड़ी बहुत जंगली झाड़ियां और चारों तरफ सिर्फ रेत। ना खाने का कोई इंतजाम, ना पीने के पानी का कोई स्रोत। निराशा के बादल उन पर छा गए। कुछ लोग घुटनों के बल बैठकर रोने लगे। कुछ अपने परिवार को याद करके चिल्लाने लगे तो कुछ बस सिर पकड़ कर बैठ गए। यकीन नहीं कर पा रहे थे कि वे वाकई जिंदा हैं या यह कोई भयानक सपना है। इसी हताशा के बीच एक स्कूल टीचर मिस्टर डेविड आगे आए। उन्होंने बुलंद आवाज में कहा, दोस्तों अगर हम घबरा गए तो हम सब मारे जाएंगे। हमें जीना है एक दूसरे के लिए जीना है।
उनकी आवाज में एक भरोसा था जिसने टूटे हुए लोगों में एक नई उम्मीद जगाई। सब संगठित हुए और घायलों की देखभाल शुरू की गई। अब सबसे बड़ी चुनौती थी भूख और प्यास। एक नौजवान माइकल हिम्मत करके नारियल के एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गया और कुछ नारियल तोड़कर लाया। वो कुछ नारियल 60 लोगों के लिए कुछ भी नहीं थे। लेकिन वह सिर्फ नारियल नहीं थे। वो उम्मीद की पहली खुराक थे। लोगों ने बारिश के पानी को चट्टानों के गड्ढों में इकट्ठा करना शुरू किया और उसे पीना शुरू किया। मिस्टर डेविड ने सबको छोटी-छोटी टीमों में बांट दिया। एक टीम को द्वीप पर खाने लायक फल या जड़े खोजने का काम मिला तो दूसरी टीम को शेल्टर बनाने का। सबसे मुश्किल काम था मछली पकड़ने का।
कुछ नौजवानों ने पेड़ों की नुकीली डालियों से भाले बनाए और घंटों समंदर के किनारे खड़े रहकर मछली पकड़ने की कोशिश करने लगे। कई नाकाम कोशिशों के बाद आखिरकार उन्होंने एक छोटी सी मछली पकड़ ही ली। उस दिन जब उस मछली को आग पर पकाया गया तो उसकी खुशबू किसी दावत से कम नहीं थी। सब ने उसका एक-एक छोटा टुकड़ा खाया। वो सिर्फ एक मछली का टुकड़ा नहीं था। वो उनकी पहली जीत थी। उस पल ने उन्हें सिखाया कि अब यही उनकी जिंदगी है जहां हर चीज को बांट कर जीना होगा। दोस्तों कहानी में आगे क्या हुआ यह जानने से पहले एक छोटी सी रिक्वेस्ट। अगर आपको यह सच्ची घटना दिल को छू रही है तो प्लीज
और हां, कमेंट्स के बगल में जो नया हाइप का बटन है, उसे भी जरूर दबाइएगा। दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में बदलने लगे। अब उन्हें समझ आ गया था कि मदद शायद कभी नहीं आएगी। उन्हें यहीं जीना होगा। उन्होंने पेड़ों की पत्तियों, डालियों और नारियल के रेशों से छोटी-छोटी झोपड़ियां बनानी शुरू कर दी। पहली बारिश में ही उनकी सारी मेहनत पर पानी फिर गया। झोपड़ियां लीक करने लगी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और ज्यादा मजबूती से शेल्टर बनाए। जरूरत ने उन्हें वह सब कुछ सिखा दिया जो उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था। कुछ लोगों ने मछली को धुआं देकर सुखाना सीख लिया ताकि उसे लंबे समय तक बचाया जा सके। एक महिला जो नर्स थी उसने जंगली पत्तों से छोटी-मोटी चोटों और बीमारियों का इलाज करना सीख लिया। उन्होंने फैसला किया कि अगर यहां जीना है तो भविष्य के लिए सोचना होगा। उन्होंने नारियल के बीजों को द्वीप के चारों तरफ बोना शुरू किया।
जंगली पौधों की कलमों को लगाना शुरू किया। उन्होंने समंदर के किनारे रेत पर नारियल के पेड़ों को गिराकर एक बहुत बड़ा हेल्प लिखा इस उम्मीद में कि शायद कोई हवाई जहाज इसे देख ले। एक दिन दूर आसमान में एक जहाज दिखा भी। सब पागलों की तरह चिल्लाए। आग जलाकर धुआं किया लेकिन जहाज ने उन्हें नहीं देखा और गुजर गया। उस दिन कई लोगों की उम्मीद पूरी तरह टूट गई। शुरुआती दो-तीन महीने सबसे कठिन थे। अनजान द्वीप का माहौल, खाने की कमी और साफ पानी ना होने की वजह से बीमारियां फैलने लगी। निराशा और अकेलेपन ने कई लोगों को मानसिक रूप से तोड़ दिया। एक-एक करके 10 लोगों ने दम तोड़ दिया। हर मौत उनके लिए एक गहरा सदमा होती। वे अपने साथी को अपने हाथों से रेत में दफनाते और असहाय होकर रोते। अब वह 60 से 50 रह गए थे। उधर बाहरी दुनिया में महीनों के सर्च ऑपरेशन के बाद भी जब पैनम फ्लाइट सिक्स का कोई सुराग नहीं मिला तो सरकार ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनके परिवारों के लिए शोक सभाएं हुई। अखबारों में उनके नाम छापे गए। दुनिया के लिए वे 77 लोग अप्र प्रशांत महासागर की गहराइयों में दफने एक दर्दनाक याद बनकर रह गए थे। उन्हें नहीं पता था कि उनमें से 50 लोग अभी भी एक अनजान द्वीप पर हर दिन मौत से लड़ रहे थे।
इस उम्मीद में कि कोई उन्हें बचाने आएगा। लेकिन दुनिया उन्हें भुला चुकी थी। यह उनके संघर्ष का सबसे काला अध्याय था। जब उन्हें लगा कि वे अब हमेशा के लिए यहीं फंस गए हैं। 2 साल बीत चुकी थे। जिंदगी अब एक ढर्रे पर आ गई थी। उन्होंने जीना सीख लिया था। और फिर उस वीरान द्वीप पर एक चमत्कार हुआ। एक महिला ने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया। उस बच्ची की पहली किलकारी ने पूरे द्वीप के माहौल को बदल दिया। जहां अब तक सिर्फ मौत और निराशा थी। वहां अब जिंदगी का संगीत गूंज रहा था। हर कोई उस नन्ही जान को देखने आया। उनकी आंखों में आंसू थे। लेकिन इस बार यह आंसू खुशी के थे। उस बच्ची ने सबको जीने की एक नई वजह दे दी। वो सिर्फ एक बच्ची नहीं थी। वो इस बात का सबूत थी कि सबसे मुश्किल हालातों में भी जिंदगी हार नहीं मानती। वो उनकी उम्मीद की नई मशाल थी। लोगों ने उस दिन को एक त्यौहार की तरह मनाया क्योंकि 2 साल बाद मौत पर जिंदगी की जीत हुई थी। अब उन्हें सिर्फ खुद के लिए नहीं बल्कि इस नई पीढ़ी के लिए भी जीना था और इस द्वीप को एक बेहतर जगह बनाना था। देखतेदेखते 10 साल गुजर गए। द्वीप पर अब जिंदगी का एक सिस्टम बन चुका था। मिस्टर डेविड ने बच्चों के लिए एक छोटा सा स्कूल खोल दिया था। जहां वे उन्हें पढ़ना, लिखना और दुनिया के बारे में बताते थे। उस दुनिया के बारे में जिसे इन बच्चों ने कभी देखा ही नहीं था। सब ने अपने-अपने काम बांट लिए थे।
कुछ लोग मछली पकड़ते, कुछ खेती करते, कुछ बच्चों की देखभाल करते। उन्होंने अपने मनोबल को बनाए रखने के लिए प्लेन क्रैश की बरसी को सर्वाइवल डे के रूप में मनाना शुरू कर दिया। उस दिन वे गाना गाते, कहानियां सुनाते और उन साथियों को याद करते जो अब उनके साथ नहीं थे। इन 10 सालों में द्वीप पर पांच और बच्चों का जन्म हुआ। लेकिन इस दौरान बीमारियों और हादसों में सात और बड़े लोग अपनी जान गवा चुके थे। अब द्वीप की कुल आबादी बच्चों को मिलाकर 48 थी। एक दिन फिर वही हुआ। आसमान में एक प्लेन की गूंज सुनाई दी। सब फिर से दौड़े। फिर से चिल्लाए। लेकिन नतीजा वही रहा। प्लेन उन्हें बिना देखे गुजर गया। बार-बार मिलती निराशा ने अब उन्हें तोड़ना बंद कर दिया था। शायद उन्होंने इसे ही अपनी किस्मत मान लिया था। पूरे 13 साल बीत चुके थे। जो बच्चे द्वीप पर पैदा हुए थे, वे अब किशोर हो चुके थे। उनके लिए यही दुनिया थी, यही घर था। जो बड़े थे, वे अब बूढ़े हो चले थे, उनके चेहरे पर संघर्ष की लकीरें साफ दिखती थी। फिर एक सुबह एक ऐसी आवाज सुनाई दी, जो उन्होंने 13 सालों में नहीं सुनी थी। एक बड़े जहाज के हॉर्न की आवाज। पहले तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। उन्हें लगा कि यह भी उनका कोई वहम है।
लेकिन जब आवाज दोबारा आई तो सब पागलों की तरह समंदर के किनारे की ओर भागे। उन्होंने अपनी पूरी ताकत से आग जलाई, चिल्लाए, हाथ हिलाए। उनकी आंखों में एक आखिरी उम्मीद की चमक थी। और इस बार, इस बार चमत्कार हुआ। जहाज ने उन्हें देख लिया था। जहाज रुका, और उनसे कुछ दूर लंगर डाल दिया। उस पल को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। 48 लोग एक दूसरे को पकड़ कर रो रहे थे, हंस रहे थे, चिल्ला रहे थे। 13 साल का लंबा भयानक इंतजार खत्म हो गया था। जब रेस्क्यू टीम नाव से द्वीप पर पहुंची तो उनकी आंखों में भी आंसू थे। वे उन लोगों को देख रहे थे जिन्हें दुनिया मरा हुआ मान चुकी थी। जब वे 48 लोग वापस शहर लौटे तो दुनिया हैरान रह गई। वे अब पहले जैसे इंसान नहीं थे। शहर की चकाचौंध, गाड़ियां, इमारतें सब कुछ उन्हें अजीब लग रहा था। उनकी कहानी किसी को भी यकीन नहीं हो रही थी जब तक कि एक सर्वाइवर की डायरी सामने नहीं आई।
उस डायरी में 13 साल का हर एक दिन, हर एक संघर्ष और हर एक मौत और हर एक जन्म का हिसाब लिखा हुआ था। जब मीडिया ने उस डायरी के पन्नों को दुनिया के सामने रखा तो हर कोई रो पड़ा। यह इंसान के हौसले, हिम्मत और जीने की जिद की एक अविश्वसनीय दास्ता थी। इस सच्ची घटना पर बाद में एक किताब भी लिखी गई जिसका नाम था द लॉस्ट सर्वाइवर्स ऑफ फ्लाइट सिक्स 13 इयर्स ऑन द आइलैंड। यह कहानी आज भी हमें सिखाती है कि उम्मीद की एक छोटी सी किरण भी सबसे घने अंधेरे को चीर सकती है और इंसान का हौसला हर मुश्किल से बड़ा होता है। दोस्तों, आपको इन 48 सर्वाइवर्स की यह दिल दहला देने वाली कहानी कैसी लगी? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि 13 साल एक वीरान द्वीप पर बिताना कैसा होता होगा? अपनी राय नीचे कमेंट्स में जरूर बताइएगा।

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